फ़तेह सिंह, चंडीगढ़ : जब भी कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है, तो अक्सर कुछ दवाइयां खाकर उसे तुरंत राहत मिल जाती है। लेकिन कुछ ही दिनों या महीनों बाद वही बीमारी फिर से परेशान करने लगती है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि कई रोग ऐसे होते हैं, जिन्हें अगर जड़ से खत्म न किया जाए तो वे बार-बार लौट आते हैं। आज की आधुनिक चिकित्सा प्रणाली लक्षणों से त्वरित राहत देने में तो प्रभावी है, लेकिन रोग के मूल कारण को समाप्त करने पर अपेक्षाकृत कम ध्यान देती है। यही कारण है कि अब लोगों का रुझान तेजी से आयुर्वेद की ओर बढ़ रहा है, क्योंकि आयुर्वेद रोग को जड़ से समाप्त करने की पद्धति पर काम करता है।
प्राचीन काल से ही मानव रोगों से मुक्ति पाने के लिए प्रयास करता रहा है। उसी दौर में ऋषि-मुनियों ने जड़ी-बूटियों, प्राकृतिक तत्वों और संतुलित जीवनशैली के आधार पर एक वैज्ञानिक चिकित्सा प्रणाली विकसित की, जिसे आयुर्वेद कहा गया। ‘आयुर्वेद’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—आयुष और वेद, जिसका अर्थ है ‘जीवन का विज्ञान’। सरल शब्दों में कहें तो आयुर्वेद जीवन को सही ढंग से जीने की कला और विज्ञान है।
चूंकि आयुर्वेद की मूल रचनाएं संस्कृत भाषा में हैं, इसलिए आम लोगों को इसके सिद्धांतों को समझने में कठिनाई होती है। दोष, गुण, रस, प्रकृति और धातु जैसे शब्द प्रचलन में तो हैं, लेकिन इनके वास्तविक अर्थ और महत्व से बहुत से लोग अनभिज्ञ हैं। इसी कारण आयुर्वेद को लेकर कई भ्रांतियां भी बनी रहती हैं। हमारा प्रयास है कि आयुर्वेद के इन मूल सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाया जाए, ताकि आम व्यक्ति भी इसे आसानी से समझ सके और अपने जीवन में अपनाकर लाभ उठा सके।
आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें चिकित्सक केवल रोग के लक्षणों को नहीं देखता, बल्कि रोगी के मन, उसकी शारीरिक प्रकृति, दोषों—वात, पित्त और कफ—और धातुओं की स्थिति का भी गहन अध्ययन करता है। यही कारण है कि एक ही बीमारी से पीड़ित दो अलग-अलग व्यक्तियों का इलाज अलग-अलग हो सकता है। उनकी दवाइयां, आहार और दिनचर्या उनकी प्रकृति और दोषों के अनुसार तय की जाती हैं।
अब सवाल यह उठता है कि ये दोष, मन, प्रकृति और धातु आखिर हैं क्या? आयुर्वेद के अनुसार शरीर में वात, पित्त और कफ—इन तीन दोषों का संतुलन ही अच्छे स्वास्थ्य का आधार है। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तभी रोग उत्पन्न होते हैं। आगे के लेखों में इन्हीं दोषों और उनके प्रभाव को विस्तार से समझाया जाएगा, ताकि रोग के कारणों को पहचानकर स्थायी समाधान की दिशा में कदम बढ़ाया जा सके।
जब आप किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक के पास जाते हैं, तो अक्सर यह कहा जाता है कि आपके शरीर में वात बढ़ गया है या पित्त के असंतुलन के कारण समस्या उत्पन्न हुई है। लेकिन वास्तव में ये वात, पित्त और कफ क्या हैं और इनके असंतुलन से शरीर को क्या नुकसान होता है?
आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर पांच महाभूतों—जल, पृथ्वी, आकाश, अग्नि और वायु—से मिलकर बना है। इन्हीं तत्वों के संयोजन से शरीर में तीन प्रमुख दोष बनते हैं—वात, पित्त और कफ। यदि ये तीनों दोष संतुलित अवस्था में रहते हैं तो व्यक्ति स्वस्थ रहता है, लेकिन इनमें से किसी एक का भी संतुलन बिगड़ने पर रोग उत्पन्न होने लगते हैं। तीन दोष होने के कारण ही इसे ‘त्रिदोष सिद्धांत’ कहा गया है।
प्रत्येक दोष दो-दो महाभूतों से मिलकर बना होता है और उन्हीं तत्वों के स्वभाव के अनुसार उसके लक्षण तय होते हैं। दोषों के असंतुलन के दो मुख्य कारण होते हैं—किसी दोष की वृद्धि या उसकी कमी। आमतौर पर दोष की वृद्धि ही रोगों का कारण बनती है। खराब जीवनशैली और असंतुलित खान-पान इन दोषों को प्रभावित करते हैं और यही बीमारियों की जड़ बनते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार शरीर का निर्माण दोष, धातु और मल—इन तीनों से होता है, जिसमें दोषों को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। जब दोष संतुलित रहते हैं तो धातु और मल भी स्वस्थ रहते हैं, लेकिन दोषों के दूषित होने पर ये भी प्रभावित हो जाते हैं और रोग उत्पन्न होता है।
1. वात दोष
वात दोष ‘वायु’ और ‘आकाश’ तत्वों से मिलकर बना है। इसे सबसे महत्वपूर्ण दोष माना गया है क्योंकि शरीर में होने वाली सभी गतियां—जैसे रक्त संचार, श्वसन, मल-मूत्र त्याग—वात के कारण ही संभव होती हैं। शरीर के भीतर मौजूद सभी रिक्त स्थानों में वायु का वास होता है और अंगों के बीच संपर्क भी वात के माध्यम से ही बनता है।
वात इतना प्रभावशाली होता है कि यह अन्य दोषों को भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा देता है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में अधिकांश रोगों का मूल कारण वात ही माना गया है। जिन व्यक्तियों में वात अधिक होता है, उन्हें वात प्रकृति वाला कहा जाता है।
वात का स्थान:
वात का मुख्य स्थान कोलन (पेट), नाभि के नीचे का भाग, छोटी-बड़ी आंतें, कमर, जांघ, टांगें और हड्डियां हैं।
वात का प्रभाव:
वात के गुण रुखा, शीतल, हल्का और सूक्ष्म होते हैं। संतुलित वात से रक्त संचार और मल-मूत्र का प्रवाह ठीक रहता है। वात प्रकृति वाले लोग सामान्यतः दुबले-पतले, रूखे शरीर वाले, कम नींद लेने वाले और जल्दी घबराने या चिड़चिड़ाने वाले होते हैं।
2. पित्त दोष
पित्त दोष ‘अग्नि’ और ‘जल’ तत्वों से मिलकर बना है। यह शरीर में ऊष्मा उत्पन्न करता है और पाचन, एंजाइम तथा हार्मोन के कार्य को नियंत्रित करता है। भोजन को पचाकर उसे रक्त, हड्डी, मांस और ऊर्जा में बदलने का कार्य पित्त के माध्यम से ही होता है। मानसिक गुण जैसे बुद्धि, साहस और उत्साह भी पित्त से जुड़े हैं।
पित्त की कमी का अर्थ है कमजोर पाचन अग्नि। जिन व्यक्तियों में पित्त अधिक होता है, वे पित्त प्रकृति वाले कहलाते हैं।
पित्त का स्थान:
पेट, छोटी आंत, नाभि का मध्य भाग, रक्त, पसीना, पाचन तंत्र और मूत्र संस्थान।
पित्त का प्रभाव:
पित्त के संतुलित रहने से पाचन सही रहता है। गर्मी सहन न कर पाना, त्वचा पर धब्बे, अधिक पसीना, बालों का जल्दी सफेद होना और शरीर से तेज गंध आना पित्त के लक्षण माने जाते हैं।
3. कफ दोष
कफ दोष ‘पृथ्वी’ और ‘जल’ तत्वों से मिलकर बना है। यह शरीर को स्थिरता, मजबूती और पोषण प्रदान करता है। कफ दोष वात और पित्त को भी नियंत्रित करता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता, धैर्य, क्षमा, बल और नींद कफ से संबंधित गुण हैं।
कफ का स्थान:
पेट, छाती, गला, सिर, गर्दन, जोड़ों, ऊपरी पेट और वसा।
कफ का प्रभाव:
कफ प्रकृति वाले लोग सामान्यतः शांत, स्थिर, मजबूत शरीर वाले, कम भूख-प्यास वाले और सौम्य स्वभाव के होते हैं। इनमें शरीर में चिकनाहट और मजबूती अधिक पाई जाती है।
आयुर्वेद के अनुसार, त्रिदोषों का संतुलन ही अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है। जब वात, पित्त और कफ संतुलित रहते हैं, तब शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। यही संतुलन आयुर्वेदिक उपचार का मूल उद्देश्य है।










