The India Post Bureau : उत्तर भारत में कृषि परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अब किसान पारंपरिक गेहूं-धान जैसी फसलों से हटकर नकदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इस कड़ी में केले की खेती एक आकर्षक और लाभकारी विकल्प के रूप में उभर रही है। प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह के अनुसार, वैज्ञानिक पद्धतियों से की गई केले की खेती किसानों की आमदनी को कई गुना बढ़ा सकती है।
उपयुक्त जलवायु और समय, केला उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में अच्छी उपज देता है। उत्तर भारत के वे क्षेत्र जहां सर्दी अधिक तीव्र नहीं होती, वहां यह खेती विशेष रूप से अनुकूल है। केला लगाने का सबसे उपयुक्त समय जून-जुलाई का माना जाता है, हालांकि सिंचाई सुविधा होने पर फरवरी-मार्च भी उपयुक्त रहता है। 15 सितंबर के बाद रोपण से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इससे उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
मिट्टी और पोषण प्रबंधन, केले के लिए रेतीली दोमट या जलोढ़ मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। मिट्टी का पीएच 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। खेत की अच्छी जुताई, खरपतवार नियंत्रण और 10-15 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद डालना अनिवार्य है। हरी खाद (जैसे ढैचा) का उपयोग मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाता है।
उर्वरक प्रबंधन में संतुलन जरूरी है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के अनुसंधान अनुसार, प्रत्येक पौधे के लिए 200 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फॉस्फोरस और 300 ग्राम पोटाश तीन किश्तों में देना उपयुक्त है। सूक्ष्म पोषक तत्वों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
गुणवत्ता युक्त पौधे और वैज्ञानिक रोपण केले की खेती में दो प्रकार की रोपण सामग्री का प्रयोग किया जाता है —
सकर (suckers), ऊतक संवर्धित पौधे (Tissue culture plants)
टीशू कल्चर पौधे भले ही महंगे हों, लेकिन रोगमुक्त और एकसमान वृद्धि वाले होते हैं। रोपण के लिए गड्ढों का आकार 60x60x60 सेमी रखें। बौनी किस्मों के लिए 1.8×1.8 मीटर तथा लंबी किस्मों के लिए 2.0×2.0 मीटर दूरी आदर्श है।
सिंचाई और रोग-कीट प्रबंधन , ड्रिप सिंचाई प्रणाली को अपनाना केला उत्पादन में जल संरक्षण के साथ-साथ निरंतर नमी सुनिश्चित करने के लिए सर्वोत्तम माना गया है। गर्मियों में 7–10 दिन और सर्दियों में मिट्टी की नमी के अनुसार सिंचाई करें। रोग और कीटों में फ्यूजेरियम विल्ट, सिगाटोका पत्ती धब्बा, और बंची टॉप वायरस प्रमुख हैं। थ्रिप्स, नेमाटोड और घुन से बचाव हेतु रोगमुक्त रोपण सामग्री, जैविक नियंत्रण, और फसल चक्र अत्यंत आवश्यक है।
कटाई और विपणन, पौध रोपण के 12–15 माह बाद फल तैयार हो जाते हैं। पूरी तरह विकसित लेकिन हरे फलों की सावधानीपूर्वक कटाई करें। इसके बाद ग्रेडिंग, धुलाई, नियंत्रित पकाना और सुरक्षित परिवहन से बाजार में बेहतर कीमत प्राप्त की जा सकती है।
निष्कर्ष : प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह का मानना है कि उत्तर भारत के किसान यदि केले की खेती को वैज्ञानिक तरीके से अपनाते हैं, तो वे कम समय में अधिकतम मुनाफा कमा सकते हैं। सरकार की सब्सिडी योजनाओं और तकनीकी सहायता के साथ मिलकर यह फसल आर्थिक रूप से सशक्त कृषि मॉडल बन सकती है।



















