देहरादून: पहाड़ी राज्य उत्तराखंड भारत का पहला ऐसा राज्य है जिसने किसानों की आर्थिकी को मजबूत करने और पलायन को रोकने के लिए ‘औद्योगिक भांग’ (Industrial Hemp) की खेती को कानूनी मान्यता दी है। बंजर होती जमीन और जंगली जानवरों (बंदरों और सुअरों) द्वारा फसलों को पहुंचाए जा रहे नुकसान से परेशान किसानों के लिए यह एक ‘कैश क्रॉप’ (Cash Crop) के रूप में वरदान साबित हो रही है।
हालांकि, कई लोगों में यह भ्रांति है कि सरकार ने ‘नशे वाली भांग’ की खेती को छूट दे दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह खेती NDPS एक्ट 1985 की धारा 14 के तहत सख्त निगरानी में केवल औद्योगिक और वैज्ञानिक/औषधीय उद्देश्यों के लिए की जाएगी।
क्या है भांग की खेती का 0.3% THC नियम?
सरकार ने केवल उसी भांग की खेती को वैध माना है, जिसमें नशे का कारक यानी टेट्राहाइड्रोकैनाबिनोल (THC) की मात्रा 0.3% से कम हो। इस भांग का उपयोग उच्च गुणवत्ता वाले कपड़े (फाइबर), बीज, पौष्टिक तेल और आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने में किया जाता है। यदि फसल में THC की मात्रा 0.3% से अधिक पाई जाती है, तो उसे अवैध माना जाएगा और फसल को नष्ट कर दिया जाएगा।
लाइसेंस के लिए कौन कर सकता है आवेदन (Eligibility Criteria)?
उत्तराखंड आबकारी विभाग और सरकार के नियमों के अनुसार, निम्नलिखित लोग और संस्थाएं लाइसेंस प्राप्त कर सकती हैं:
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राज्य का कोई भी किसान जिसकी अपनी भूमि हो।
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किसान उत्पादक संगठन (FPOs), स्वयं सहायता समूह (SHGs) और सहकारी संस्थाएं।
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व्यावसायिक और शैक्षणिक (R&D) संस्थान।
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शर्त: आवेदक का आपराधिक रिकॉर्ड एकदम साफ होना चाहिए और किसी भी अदालत में कोई भी आपराधिक मामला लंबित नहीं होना चाहिए।
लाइसेंस के लिए आवश्यक दस्तावेज (Required Documents)
आवेदन करने से पहले किसानों या कंपनियों को निम्नलिखित कागजात तैयार रखने होंगे:
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भूमि का प्रमाण: खेत का मालिकाना हक (खसरा और खतौनी)।
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NOC: यदि जमीन लीज (पट्टे) पर ली गई है, तो भूमि स्वामी का शपथ-पत्र के साथ अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC)।
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नक्शा: खेत के जीपीएस (GPS) कोऑर्डिनेट, जियो-टैगिंग और भूमि का नक्शा।
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चरित्र प्रमाण पत्र: पुलिस या सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया ‘उत्तम चरित्र प्रमाण पत्र’ (Good Character Certificate)।
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उपज के सुरक्षित भंडारण (Storage) की व्यवस्था का दस्तावेजी प्रमाण।
लाइसेंस प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया (Step-by-Step Application Process)
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आवेदन जमा करना: आवेदक को निर्धारित प्रारूप (फॉर्म IHC-A1) में अपने जिले के जिलाधिकारी (District Magistrate) या जिला आबकारी कार्यालय में आवेदन करना होगा।
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समिति द्वारा भौतिक सत्यापन: जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक विशेष समिति बनाई जाती है (जिसमें आबकारी अधिकारी, मुख्य उद्यान अधिकारी, ड्रग इंस्पेक्टर आदि शामिल होते हैं)। यह समिति दस्तावेजों और खेत का ‘ऑन-द-स्पॉट’ निरीक्षण करती है।
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शुल्क और मंजूरी: समिति की सिफारिश के बाद, आबकारी आयुक्त (Excise Commissioner) द्वारा लाइसेंस जारी किया जाता है। इसके लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 1000 रुपये (अनुमानित) का वार्षिक अनुज्ञापन शुल्क जमा करना होता है। यह लाइसेंस अधिकतम 5 वर्षों के लिए वैध होता है।
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बीज और फसल की टेस्टिंग: किसानों को सरकार द्वारा प्रमाणित बीज ही बोने होते हैं। फसल तैयार होने पर नोडल एजेंसी ‘सेंटर फॉर एरोमैटिक प्लांट्स’ (CAP), सेलाकुई फसल के सैंपल की जांच करती है ताकि THC स्तर को मापा जा सके।
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उपज की बिक्री: किसान अपनी उपज को खुले बाजार में नहीं बेच सकते। इसे केवल राज्य सरकार द्वारा अधिकृत खरीदारों या लाइसेंस प्राप्त औद्योगिक इकाइयों को ही बेचा जा सकता है।
कानूनी चेतावनी: बिना सरकारी लाइसेंस के या निर्धारित क्षेत्र से बाहर भांग की खेती करना ‘नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस’ (NDPS) एक्ट, 1985 के तहत एक गंभीर दंडनीय अपराध है, जिसमें भारी जुर्माना और जेल का प्रावधान है।














