पश्चिम बंगाल में राजनीतिक बदलाव के पीछे किसी मशीन या प्रशासनिक मेहरबानी का हाथ नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जमीनी कार्यकर्ताओं का वो अटूट मनोबल है, जिसने पिछले 15 सालों में अभूतपूर्व हिंसा और दहशत का सामना किया है। साल 2011 से लेकर 2025 तक बंगाल की धरती ने सैकड़ों भाजपा कार्यकर्ताओं के शव देखे हैं। किसी को बम से उड़ाया गया, तो किसी की लाश पेड़ से लटका दी गई या नदी में मिली।
नंदीग्राम, बीरभूम, कूचबिहार और बशीरहाट जैसे इलाकों में चुनाव के बाद “बदले” की जो राजनीति खेली गई, उसने हजारों घरों को राख में बदल दिया और पूरे-पूरे गाँव खाली करवा दिए गए। यहाँ तक कि महिला मोर्चा की कार्यकर्ताओं को डराने के लिए बलात्कार को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया, जिस पर कलकत्ता हाईकोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर सीबीआई (CBI) जांच के आदेश देने पड़े। लेकिन इस भीषण दहशत के बावजूद कार्यकर्ताओं का हौसला नहीं टूटा। जिस परिवार के बूथ अध्यक्ष की लाश सुबह पेड़ से लटकी मिलती, उसका बेटा दोपहर को उसी बूथ पर एजेंट बनकर बैठ जाता। जिन महिलाओं के घर जलाए गए, वे अगले चुनाव में फिर से हाथों में झंडा लेकर गलियों में निकल पड़ीं।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के शासनकाल में राजनीतिक मुकदमों, जेल, सामाजिक बहिष्कार और रोजगार छिनने के दौर को कार्यकर्ताओं ने अपनी छाती पर झेला। 15 साल की इस कठिन तपस्या का चुनावी ग्राफ गवाह है:
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2011: मात्र 1 विधायक
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2016: 3 विधायक
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2019 लोकसभा: 18 सांसद (जिसने पूरे देश में हड़कंप मचाया)
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2021 विधानसभा: 77 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल बनना
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2024 लोकसभा: 20 से अधिक सीटें
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2026 विधानसभा: ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन
यह चुनावी सफलता किसी ईवीएम (EVM) या चुनाव आयोग की वजह से नहीं मिली है, बल्कि यह उन माताओं के सब्र का नतीजा है जिन्होंने अपने बेटों की तेरहवीं पर लड़ाई जारी रखने की कसम खाई थी। रिलीफ कैंपों में सालों गुजारने के बाद भी झुकने से इनकार करने वाली बस्तियों और हिंदुओं के अभूतपूर्व रूप से संगठित होने के कारण ही आज बंगाल में कमल खिला है। आलोचकों को यह समझने की जरूरत है कि बंगाल में भाजपा की जीत के पीछे एक-एक वोट के बदले दी गई कार्यकर्ताओं की बड़ी कुर्बानी छिपी है।















