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Home Agriculture

जलजमाव के बाद रोगों का प्रकोप, किसानों के लिए बचाव और प्रबंधन उपाय

admin by admin
September 29, 2025
in Agriculture
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जलजमाव के बाद रोगों का प्रकोप, किसानों के लिए बचाव और प्रबंधन उपाय
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प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह : बिहार में इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है, किंतु देश के कई हिस्सों में भारी वर्षा और बाढ़ की स्थिति बनी रही। सितंबर माह में मानसून के सक्रिय होने के कारण बिहार के अनेक जिलों में अचानक जलजमाव की समस्या उत्पन्न हुई, जिससे किसानों के फलदार पेड़ और फसलें प्रभावित हो रही हैं। कई स्थानों से बागों में पेड़ों के सूखने और उत्पादन घटने की शिकायतें प्राप्त हो रही हैं।

जलजमाव के कारण और परिणाम

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अत्यधिक वर्षा, खराब जल निकासी और सघन मिट्टी, जलभराव की मुख्य वजह हैं। इसका सीधा असर फलों के पेड़ों पर पड़ता है……

• पौधों की जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे वे गलने लगती हैं।

• पानी और पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो जाता है।

• प्रकाश संश्लेषण की दर घटती है, जिससे विकास रुक जाता है।

• लंबे समय तक पानी रुकने पर पौधा सूख भी सकता है।

विशेषकर पपीता जैसे पौधे 24 घंटे से अधिक पानी सहन नहीं कर पाते, वहीं आम, लीची और अमरूद अपेक्षाकृत सहनशील हैं। फिर भी यदि पानी 10–15 दिनों तक नहीं निकलता, तो ये भी नष्ट हो सकते हैं।

__________________________________

पेड़ों की सहनशीलता

विभिन्न फलदार प्रजातियों की जलभराव सहनशीलता अलग-अलग होती है:

• अत्यधिक संवेदनशील: पपीता, बेर

• मध्यम सहनशील: आम, लीची, अमरूद

• अधिक सहनशील: आंवला

• छोटी फसलें: स्ट्रॉबेरी, ब्लैकबेरी, रास्पबेरी सात दिनों तक सहन कर पाती हैं।

__________________________________

जलजमाव के बाद रोगों का प्रकोप

जलजमाव कम होने के बाद फाइटोफ्थोरा जड़ सड़न जैसी बीमारियां गंभीर समस्या बन जाती हैं। इसके लक्षण हैं:

• पत्तियों का पीला पड़ना और किनारों का झुलसना

• जड़ों का सड़ना और दुर्गंध आना

• संक्रमित हिस्से में लाल-भूरा रंग और स्वस्थ हिस्से में सफेद ऊतक

यदि यह रोग समय पर नियंत्रित न किया जाए तो पेड़ स्थायी रूप से नष्ट हो सकता है।

__________________________________

किसानों के लिए बचाव और प्रबंधन उपाय

1. जल निकासी की व्यवस्था

• बाग में नालियां बनाकर या पंप की मदद से पानी निकालें।

• यदि गाद या मलबे की परत जम गई हो तो उसे हटा दें और मिट्टी को मूल स्तर पर बहाल करें।

• क्षरित मिट्टी को भरने के लिए उसी प्रकार की मिट्टी का प्रयोग करें जो बाग में पहले थी।

2. जुताई और मिट्टी सुधार

• जैसे ही मिट्टी जुताई योग्य हो, हल्की जुताई-गुड़ाई करें।

• मिट्टी को ढीला करने से उसमें वायु संचार बढ़ेगा और जड़ों को ऑक्सीजन उपलब्ध होगी।

3. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

• पेड़ों की आयु के अनुसार खाद और उर्वरक दें।

• ध्यान रखें कि सितंबर के प्रथम सप्ताह के बाद आम और लीची के बागों में कोई उर्वरक या खाद न दें, अन्यथा फरवरी में मंजर आने की जगह नई पत्तियां निकलेंगी और नुकसान होगा।

4. रोग प्रबंधन

• बाढ़ के बाद फलों के पौधे कमजोर हो जाते हैं और रोग-कीटों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।

• फाइटोफ्थोरा जड़ सड़न से बचाव के लिए रोको एम फफूंदनाशक @2 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर प्रयोग करें।

• एक वयस्क पेड़ के आसपास की मिट्टी भिगोने के लिए लगभग 30 लीटर घोल की आवश्यकता होगी।

5. केले के लिए विशेष उपाय

• बाढ़ से केला की फसल सबसे अधिक प्रभावित होती है।

• मिट्टी सूखने पर सुखी और रोगग्रस्त पत्तियों की छंटाई करें।

• अवांछित चूसक पौधों को काटकर हटा दें।

• प्रति पौधा 200 ग्राम यूरिया और 150 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश 1–1.5 मीटर की दूरी पर रिंग बनाकर दें।

• इससे पौधों की वृद्धि तेजी से सामान्य हो जाएगी।

__________________________________

किसानों के लिए महत्वपूर्ण सावधानियां

• सितंबर के बाद किसी भी प्रकार की नवीन कृषि क्रिया (खाद डालना, जुताई, छंटाई आदि) से बचें।

• केवल रोगग्रस्त पौधों को बचाने के उद्देश्य से ही उपचारात्मक क्रिया करें।

• बागों की नियमित निगरानी करें और पीले पड़ते या सूखते पौधों को तुरंत पहचानकर उपचार करें।

जलजमाव फलदार पेड़ों के लिए गंभीर चुनौती है, लेकिन यदि किसान समय पर जल निकासी, मिट्टी सुधार, उर्वरक प्रबंधन और रोग नियंत्रण जैसे उपाय अपनाएं, तो अधिकतर पेड़ों को बचाया जा सकता है। विशेष रूप से पपीता और केला जैसी संवेदनशील फसलों पर तुरंत ध्यान देना आवश्यक है।

कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार, “पेड़ बचेंगे तो फलेंगे” – अतः जलजमाव के बाद जल्द और उचित कदम उठाकर ही किसानों की मेहनत और निवेश को सुरक्षित रखा जा सकता है।

प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह, विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी,पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार

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