प्रसिद्ध मराठा इतिहासकार जी.एस. सरदेसाई (1957 में पद्म भूषण से सम्मानित) के अनुसार, शिवाजी की वाणी में गजब का प्रभाव था। वे अपने साथियों को संबोधित करते हुए उन्हें यह समझाते थे कि कैसे विदेशी मुस्लिम शासन ने उनके देश और धर्म पर अत्याचार किए हैं।
वे आगे लिखते हैं, “मुस्लिम शासन के अधीन पूर्ण अंधकार छाया हुआ था। न कोई पूछताछ होती थी, न न्याय मिलता था। स्त्रियों के सम्मान का हनन, हत्याएं, हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन, उनके मंदिरों का विध्वंस, गायों का वध – ऐसे घिनौने अत्याचार उस शासन में सामान्य बातें थीं। …यही बातें थीं, जिन्होंने शिवाजी के भीतर धर्मसम्मत क्रोध जगा दिया।”[1][2]
इतिहासकार जदुनाथ सरकार के अनुसार, “शिवाजी के राजनीतिक आदर्श ऐसे थे जिन्हें हम आज भी बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार कर सकते हैं। उनका उद्देश्य था अपने प्रजा को शांति देना, सभी जातियों और धर्मों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना, एक कल्याणकारी और निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करना।”[4]
प्रारंभिक जीवन और संस्कार
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जन्म: 19 फरवरी 1630। शिवनेर के पहाड़ी किले में जन्में। माता जीजाबाई ने स्थानीय देवी ‘शिवाई’ के नाम पर उनका नाम ‘शिवाजी’ रखा।
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संस्कार: शिवाजी का पालन-पोषण जीजामाता की बाज़ की तरह निगरानी में हुआ, जिससे उनके भीतर भारत की अमूल्य सांस्कृतिक परंपरा और धार्मिक आस्था के प्रति गर्व पैदा हुआ।[8][9]
विजयी शिवाजी और मराठा साम्राज्य
किले (Forts) शिवाजी ने कम से कम दो सौ चालीस किले और गढ़ों पर कब्जा किया और कई नए बनाए।
मुगलों के खिलाफ आजीवन संघर्ष में इन किलों का रक्षात्मक महत्व सबसे अधिक था। एक प्रशासनिक नेता के रूप में उनकी महानता निर्विवाद है। हर किले में एक हवालदार, एक सबनीस और एक सर्णोबत होता था, जो प्रशासन चलाते थे।[10][11]
सैन्य प्रबंधन और प्रभाव अपनी सैन्य व्यवस्था में शिवाजी अत्यंत कुशल थे। संख्या में कम होने के बावजूद उन्होंने कड़ा अनुशासन लागू किया।
स्कॉट-वारिंग कहते हैं, “अपने जीवन काल में शिवाजी ने 400 मील लंबी और 120 मील चौड़ी एक विशाल क्षेत्र में अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी। उनके किले भारत के पश्चिमी तट पर फैले पर्वत श्रृंखलाओं में फैले हुए थे।”[13]
राज्याभिषेक का महत्व (ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी)
शिवाजी और उनके मंत्रियों ने महसूस किया कि स्वतंत्र शासक होने के बावजूद सैद्धांतिक रूप से उनकी स्थिति मुगलों या आदिलशाही के अधीन मानी जाती थी। इसलिए एक संप्रभु राज्य (De Jure) की स्थापना के लिए राज्याभिषेक आवश्यक था।
राज्याभिषेक कैसे संपन्न हुआ: राज्याभिषेक की विधियां 30 मई 1674 को शुरू हुईं और 6 जून 1674 को सम्पन्न हुईं।
आभूषण विभाग और रामाजी दत्तो ने मिलकर बत्तीस मण सोने का सिंहासन तैयार किया। गागा भट्ट (विश्वेश्वर), जो उस समय के सबसे बड़े संस्कृत वेदांताचार्य थे, ने इस समारोह को संपन्न कराया। 11,000 ब्राह्मणों सहित कुल 50,000 लोग रायगढ़ में एकत्रित हुए।[21][23]
स्वराज्य का प्रशासन और भाषा-नीति
शिवाजी एक स्थापित शासक थे जिनके पास संगठित प्रशासन व्यवस्था थी। उनके पत्र, मुहरें और पदवी प्राचीन रामराज्य या धर्मराज्य की भावना से ओतप्रोत थे।
फारसी का मराठी और संस्कृत से प्रतिस्थापन: शिवाजी ने आधिकारिक कार्यों के लिए फारसी और उर्दू की जगह मराठी और संस्कृत को अपनाया। उन्होंने ‘राज्यव्यवहारकोष’ (राजकीय शब्दकोश) तैयार करवाया। जहां 1628 में फारसी शब्दों का उपयोग 14.4% था, वहीं 1728 तक यह घटकर नाममात्र रह गया और मराठी/संस्कृत शब्दों का उपयोग 93.7% हो गया।[25][26]
राजमुद्राएँ (Royal Seal): उस समय अधिकांश राजमुद्राएँ फारसी में होती थीं। शिवाजी ने उन्हें संस्कृत भाषा से प्रतिस्थापित किया।
उनकी राजमुद्रा पर अंकित था: “प्रतिपच्चंद्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववंदिता शाहसुनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते।” (यह राजमुद्रा नवचंद्रमा की तरह प्रतिदिन अपनी प्रभा में वृद्धि करती है और लोक-कल्याण के लिए सुशोभित है।)
केंद्रीय शासन – अष्टप्रधान मंडल: शासन के सर्वोच्च पद पर स्वयं राजा विराजमान होते थे, जिन्हें 8 मंत्रियों की एक परिषद का सहयोग प्राप्त था।
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मोरो पंत (पेशवा/मुख्य प्रधान)
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अमात्य (वित्त/आय-व्यय)
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पंडित राव (धार्मिक मामले)
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हंबीर राव मोहिते (सेनापति)
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मंत्री (राजनीतिक/कूटनीतिक मामले)
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सुमंत (परराष्ट्र संबंध)
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सचिव (राजकीय पत्राचार)
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न्यायाधीश (न्यायिक मामले)
हिंदुओं के रक्षक और सहिष्णु शासक
गजानन भास्कर महेंदले के अनुसार, “शिवाजी का राज्य हिंदुओं के लिए अनुकूल था। उन्होंने नए अनुदान हिंदू मंदिरों, मठों और वैदिक विद्वानों को दिए।” हालांकि शिवाजी की सेना में नूर बेग, शामा खान, सिद्दी इब्राहीम और क़ाज़ी हैदर जैसे मुस्लिम अधिकारी भी थे, विशेषकर नौसेना और तकनीकी (बारूद/जहाज निर्माण) कार्यों में।
कृषि नीति: शिवाजी ने किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए बीज, बैल और धन उपलब्ध कराया। राजस्व नकद के बजाय उपज (अनाज) के रूप में लिया जाता था, ताकि किसानों पर अनुचित दबाव न पड़े।
छत्रपति शिवाजी महाराज की सैन्य प्रतिभा केवल पारंपरिक युद्धों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने समय, भूगोल और संसाधनों की सीमाओं को समझते हुए दो ऐसी क्रांतिकारी सैन्य प्रणालियाँ विकसित कीं, जिन्होंने तत्कालीन महाशक्तियों (मुगलों, आदिलशाही और यूरोपीय ताकतों) को घुटनों पर ला दिया था।
आइए उनके ‘गनिमी कावा’ (छापामार युद्ध) और ‘मराठा नौसेना’ के ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व को विस्तार से समझते हैं:
1. गनिमी कावा (मराठा छापामार युद्ध प्रणाली)
‘गनिमी कावा’ दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘गनीम’ (शत्रु) और ‘कावा’ (धोखा, चतुराई या कूटनीति)। यह एक प्रकार की ‘Hit and Run’ (मारो और भागो) रणनीति थी, जिसे शिवाजी महाराज ने सह्याद्रि के दुर्गम भूगोल के अनुकूल बनाया था।
गनिमी कावा के मुख्य सिद्धांत:
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भूगोल का लाभ: शिवाजी महाराज ने कभी भी बड़ी मुग़ल या आदिलशाही सेनाओं के साथ खुले मैदान में सीधे युद्ध (Pitched battles) करने को प्राथमिकता नहीं दी। उन्होंने सह्याद्रि की दुर्गम घाटियों, घने जंगलों और पहाड़ी किलों का उपयोग अपनी ढाल के रूप में किया।
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अचानक हमला (Surprise Attacks): शत्रु जब आराम कर रहा हो, असावधान हो, या जब भारी बारिश हो रही हो, तब अचानक हमला करना इस रणनीति का मुख्य हिस्सा था।
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रसद और आपूर्ति काटना: शत्रु की सेना से सीधे लड़ने के बजाय, मराठा सैनिक उनकी रसद (Supply lines), राशन और खजाने को लूट लेते थे। भूखी-प्यासी और थकी हुई दुश्मन सेना का मनोबल अपने आप टूट जाता था।
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गतिशीलता (High Mobility): मराठा सैनिकों के पास भारी तोपें या बहुत अधिक साजो-सामान नहीं होता था। वे अपने घोड़ों पर तेजी से आते, हमला करते और पलक झपकते ही घाटियों में गायब हो जाते थे।
गनिमी कावा के ऐतिहासिक उदाहरण:
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उंबरखिंड का युद्ध (1661): जब मुग़ल सेनापति कारतलब खान एक विशाल सेना लेकर कोंकण की ओर बढ़ रहा था, तब शिवाजी ने उसे उंबरखिंड की संकरी घाटी में घेर लिया। मुग़ल सेना न आगे बढ़ सकती थी न पीछे। बिना एक भी सैनिक खोए, शिवाजी ने कारतलब खान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया।
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पुणे के लाल महल में शाइस्ता खान पर हमला (1663): रात के अंधेरे में केवल 400 चुनिंदा सैनिकों के साथ लाल महल में घुसकर शाइस्ता खान पर किया गया हमला ‘गनिमी कावा’ का सबसे साहसिक उदाहरण है, जिसमें खान की उंगलियां कट गईं और उसे भागना पड़ा।
2. मराठा नौसेना (जलदुर्ग और समुद्री वर्चस्व)
छत्रपति शिवाजी महाराज को “भारतीय नौसेना का जनक” (Father of Indian Navy) कहा जाता है। उन्होंने सदियों पहले यह पहचान लिया था कि “जलमस्य बलमस्य” (जिसका समुद्र पर अधिकार है, उसी का भूमि पर आधिपत्य है)।
नौसेना की आवश्यकता क्यों पड़ी? उस समय अरब सागर और कोंकण तट पर पुर्तगालियों, डचों, अंग्रेजों और जंजीरा के सिद्दियों का वर्चस्व था। वे भारतीय व्यापारियों को लूटते थे और तटीय गांवों पर अत्याचार करते थे। शिवाजी समझ गए थे कि एक स्वतंत्र ‘स्वराज्य’ के लिए समुद्री सीमाओं की रक्षा अनिवार्य है।
मराठा नौसेना और समुद्री रणनीति की प्रमुख विशेषताएं:
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जहाजों का स्वदेशी निर्माण: शिवाजी महाराज ने कल्याण, भिवंडी और पेन की खाड़ियों में अपने स्वयं के शिपयार्ड (जहाज निर्माण कारखाने) स्थापित किए। यहाँ तकनीकी ज्ञान के लिए कुछ यूरोपीय लोगों की मदद ली गई, लेकिन नियंत्रण पूरी तरह मराठों के पास था।
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जहाजों के प्रकार: मराठा बेड़े में विभिन्न प्रकार के लड़ाकू और व्यापारिक जहाज शामिल थे:
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गुराब (Gurab) और गलबत (Galbat): ये मुख्य लड़ाकू जहाज थे जो तेज गति से चलते थे।
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पाल (Pal) और शिबार (Shibar): बड़े जहाज जो भारी तोपें और रसद ले जाने के काम आते थे।
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जलदुर्गों (Sea Forts) का निर्माण: शिवाजी की सबसे बड़ी दूरदर्शिता समुद्र के बीच किलों का निर्माण थी।
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सिंधुदुर्ग (मालवण): यह समुद्र के बीच चट्टानों पर बना एक अजेय किला है, जिसकी नींव में सीसा (Lead) भरा गया था ताकि लहरें उसे नुकसान न पहुंचा सकें।
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इसके अलावा विजयदुर्ग, सुवर्णदुर्ग, और खांदेरी जैसे समुद्री किलों ने विदेशी नौसेनाओं को कोंकण तट से दूर रखा।
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कुशल नौसेनापति: मायनाक भंडारी, दौलत खान, दर्यासारंग और बाद में कान्होजी आंग्रे जैसे शूरवीरों ने मराठा नौसेना को उस समय की सबसे खूंखार तटीय रक्षक शक्ति बना दिया था।
शिवाजी महाराज की इन्हीं दूरदर्शी नीतियों के कारण भारतीय नौसेना ने हाल ही में अपने नए झंडे (Naval Ensign) और अपनी नई ‘रैंक व्यवस्था’ में छत्रपति शिवाजी महाराज की अष्टकोणीय राजमुद्रा और उनके प्रतीकों को शामिल कर उन्हें सर्वोच्च सम्मान दिया है।














