सनातन संस्कृति में यज्ञ को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। धर्मग्रंथों में यज्ञ को ‘ब्रह्मांड की नाभि’ कहा गया है और इसे सृष्टि का केंद्र माना गया है। इसी यज्ञ परंपरा को जीवित रखने और विश्वकल्याण के उद्देश्य से सनातन संस्था द्वारा मुंबई में ‘श्री राजमातंगी महायज्ञ’ का आयोजन किया जा रहा है।
संस्था के अनुसार वर्तमान समय में विश्व पर युद्ध और अस्थिरता का संकट मंडरा रहा है। ऐसे समय में केवल राजनीतिक और बौद्धिक प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति और साधना की भी आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से यह महायज्ञ आयोजित किया जा रहा है, ताकि भारत को आध्यात्मिक संरक्षण प्राप्त हो और राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति हो सके।
भारतीय संस्कृति में यज्ञों की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। राजसूय, अश्वमेध और पुत्रकामेष्टि जैसे यज्ञों का उल्लेख हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है। यज्ञ के माध्यम से वातावरण की शुद्धि, नकारात्मक शक्तियों का नाश और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। वैज्ञानिक शोधों में भी यज्ञ के पर्यावरण और मानव जीवन पर सकारात्मक प्रभावों को स्वीकार किया गया है।
सनातन संस्था ने बताया कि अब तक संस्था के आश्रमों में रामराज्य की स्थापना और समाज कल्याण के लिए 300 से अधिक यज्ञ और 1000 से अधिक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जा चुके हैं। इनमें अश्वमेध महासोमयाग, चंडी याग, धन्वंतरि याग और पंचमहाभूत याग जैसे विशेष अनुष्ठान शामिल हैं।
संस्था के अनुसार ‘श्री राजमातंगी देवी’ दशमहाविद्याओं में विशेष स्थान रखती हैं। उन्हें आदिशक्ति की ‘प्रधान सलाहकार’ माना जाता है। मान्यता है कि उनकी उपासना से शत्रुओं पर विजय और संकटों से रक्षा प्राप्त होती है। संस्था का कहना है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के समय भी राजमातंगी देवी का तत्व सक्रिय था, जिसके कारण आदर्श रामराज्य की स्थापना संभव हुई।
महायज्ञ के दौरान भारत की सुरक्षा, विश्वशांति और राष्ट्र की उन्नति के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जाएंगी। संस्था ने सभी श्रद्धालुओं से परिवार सहित इस आयोजन में भाग लेकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने का आग्रह किया है।















