अहमदाबाद: लेखक प्रशांत पोळ की नई पुस्तक ‘इंडिया से भारत: एक प्रवास’ सोमवार, 16 फरवरी को अहमदाबाद में प्रकाशित होने जा रही है। यह पुस्तक स्वतंत्रता के बाद भारत की उस यात्रा को रेखांकित करती है, जिसमें देश ने धीरे-धीरे ‘इंडिया’ से ‘भारत’ बनने की दिशा में कदम बढ़ाए। लेखक के अनुसार, यह पुस्तक केवल स्वतंत्र भारत का इतिहास नहीं है, बल्कि उस मानसिक, सांस्कृतिक और वैचारिक परिवर्तन की कहानी है, जिसमें देश ने अपने ‘स्व’ यानी आत्मबोध को फिर से पहचाना।
प्रशांत पोळ लिखते हैं कि एक समय भारत विश्व के सबसे समृद्ध देशों में गिना जाता था और 11वीं-12वीं शताब्दी तक विश्व की जीडीपी का बड़ा हिस्सा भारत के पास था। लेकिन विदेशी आक्रमणों और फिर ब्रिटिश शासन के कारण यह स्थिति बदल गई। 1947 में आज़ादी मिलने के बाद भी, देश अपने मूल बोध और परंपराओं से दूर रहा और लंबे समय तक औपनिवेशिक सोच की छाया में चलता रहा।
पुस्तक में लेखक ने इस बात पर चिंता जताई है कि कैसे इतिहास के कुछ हिस्सों को दबा दिया गया और आक्रमणकारियों के महिमामंडन ने समाज में हीनभावना को जन्म दिया। वे यह भी कहते हैं कि वर्षों तक भारतीय समाज अपने असली सामर्थ्य और सांस्कृतिक शक्ति को भूलता रहा।
लेखक के अनुसार, 2014 के बाद देश में एक वैचारिक और सांस्कृतिक जागरण देखने को मिला, जिसने ‘इंडिया’ से ‘भारत’ की ओर बढ़ने की प्रक्रिया को गति दी। इसी परिवर्तन की कहानी इस पुस्तक का केंद्र है।
इस पुस्तक की खास बात यह है कि इसकी प्रस्तावना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने लिखी है। लेखक ने इसके लिए उनका आभार व्यक्त किया है और कहा है कि सरसंघचालक लंबे समय से ‘स्व’ के बोध, स्वभाषा, स्वभूषा और स्वसंस्कृति पर गर्व करने का संदेश देते रहे हैं।
प्रशांत पोळ को उम्मीद है कि यह पुस्तक पाठकों के मन में अपने देश की जड़ों, संस्कृति और आत्मगौरव को लेकर एक नई समझ और चेतना पैदा करेगी, और भारत के ‘भारत’ बनने की यात्रा को समझने में सहायक होगी।














