दया देवी तिवारी, अल्मोड़ा :
यूं तो होली पूरे देश में रंगों और उमंग के साथ मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व है, लेकिन उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में इसका एक बेहद विशिष्ट और पारंपरिक स्वरूप देखने को मिलता है। कुमाऊं में बसंत पंचमी के आगमन के साथ ही होलिकोत्सव प्रारंभ हो जाता है और अब सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में भी होली ने अपना रंग पकड़ना शुरू कर दिया है।
नंदा देवी मंदिर में भव्य होलिकोत्सव और ‘खड़ी होली’ कुमाऊं की इसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक विहंगम दृश्य हाल ही में अल्मोड़ा में देखने को मिला। मां नन्दा सर्वदलीय संस्था द्वारा अल्मोड़ा के ऐतिहासिक नंदा देवी मंदिर परिसर में एक भव्य होलिकोत्सव का आयोजन किया गया।
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इस विशेष आयोजन के दौरान क्षेत्र की महिलाओं ने पूरे उत्साह के साथ पारंपरिक ‘खड़ी होली’ का गायन किया।
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कार्यक्रम में उपस्थित पूनम पालीवाल जी ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्हें इस खड़ी होली में सहभागिता करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
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उन्होंने अन्य महिलाओं के साथ पारंपरिक कुमाऊनी होली गाकर लोक संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण का आनंद लिया। उन्होंने कहा, “होली के इन मधुर लोकगीतों और सामूहिक सहभागिता ने पूरे वातावरण को भक्तिमय और उल्लासपूर्ण बना दिया। हमारी समृद्ध लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखने का यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है।”
पौराणिक महत्व और शुरुआत कुमाऊं में होली मनाने के प्रमाण पौराणिक काल (मदनोत्सव और बसंतोत्सव) से ही मिलते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से 11वीं शताब्दी के बाद जब कुमाऊं में कबीलाई शासकों का प्रभाव कम हुआ, तब यह पर्व अपने वर्तमान स्वरूप में आया।
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पुरुषों की होली: पौष महीने के पहले रविवार से शुरू होती है।
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महिलाओं की होली: इसका आरंभ ‘रंगभरी एकादशी’ (रंग एकादशी) से होता है।
‘थान’ परंपरा: कुमाऊनी संस्कृति की आत्मा कुमाऊं अंचल की एक बड़ी विशिष्टता यह है कि यहां के अधिकांश पर्व गांव के भूमि देवता या कुल देवता के ‘थान’ से शुरू होते हैं। यहां ‘मंदिर’ के बजाय देवी थान, द्याप्त थान और गोलज्यू थान जैसे शब्द अधिक अपनेपन का अहसास कराते हैं। रंग एकादशी के दिन गांव की महिलाएं इसी ग्राम देवता के ‘थान’ में एकत्रित होकर देव आराधना (गणेश, राम, शिव की स्तुति) के साथ होली गायन शुरू करती हैं।
‘होईक खई’ (होली का अखाड़ा) और महिलाओं का ‘स्वांग’ होली के दौरान ग्राम देवता के थान या किसी सार्वजनिक आंगन में होली का अखाड़ा सजता है, जिसे ‘होईक खई’ कहा जाता है।
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पुरुषों की टोली दिन भर घर-घर जाकर होली गाती है और रात में अखाड़े में गायन करती है।
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वहीं, महिलाएं दिन के समय गायन करती हैं और अखाड़े में ‘स्वांग’ (नाटक/Satire) रचाती हैं, जो साहित्य की ‘व्यंग्य विधा’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। होली चतुर्दशी के दिन ‘अखाड़ा भेंटना’ एक पवित्र रस्म मानी जाती है।
सुरों और दिलों के मिलन का उत्सव कुमाऊं की खड़ी और बैठकी होली संस्कृति, संगीत और लोक कला का एक ऐसा मेल है जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता। यह त्योहार केवल रंगों का नहीं, बल्कि सुरों और दिलों के मिलन का उत्सव है। यदि आप देवभूमि की असली संस्कृति को महसूस करना चाहते हैं, तो एक बार कुमाऊं की होली का अनुभव जरूर करें।













