चंडीगढ़: गुरु केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले मार्गदर्शक होते हैं। जैसे श्री दत्तगुरु ने 24 गुणगुरुओं से सीख ग्रहण की, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक परिस्थिति में गुण देखने की दृष्टि गुरु ही प्रदान करते हैं। यह विचार सनातन संस्था द्वारा गुरुपूर्णिमा के अवसर पर जारी संदेश में व्यक्त किए गए।
संस्था के अनुसार सामान्यतः व्यक्ति अपने तथा दूसरों के गुणों के बजाय स्वभावदोषों और कमियों पर अधिक ध्यान देता है, जिससे वह जीवन के अनेक आनंदमय क्षणों का अनुभव करने से वंचित रह जाता है। गुरुकृपायोग व्यक्ति में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर उसे स्वभावदोष और अहं के निर्मूलन के माध्यम से आनंदमय जीवन की ओर अग्रसर करता है।
संदेश में श्री गुरुचरित्र का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि गंगा पापों का, चंद्रमा ताप का और कल्पवृक्ष दैन्य का नाश करता है, जबकि श्रीगुरु के दर्शन मात्र से पाप, ताप और दैन्य—तीनों का नाश हो जाता है। गुरु जीव को मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं तथा उनकी कृपा से साधक के जीवन में अंतर्मुखता, सात्त्विकता और आत्मिक आनंद का विकास होता है।
सनातन संस्था ने बताया कि गुरुकृपायोग की अष्टांग साधना में नामजप, सत्संग, सत्सेवा, सत् के लिए त्याग, निरपेक्ष प्रेम, स्वभावदोष-निर्मूलन, अहं-निर्मूलन और भाववृद्धि प्रमुख अंग हैं। इनका नियमित अभ्यास साधक की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है और उसके भीतर यह भाव दृढ़ करता है कि जीवन में सब कुछ ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही होता है।
संदेश में युवाओं से विशेष आह्वान किया गया कि वे वृद्धावस्था की प्रतीक्षा किए बिना युवावस्था से ही साधना प्रारंभ करें। संस्था का कहना है कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य ईश्वरप्राप्ति है और साधना व्यक्ति को जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करती है।
गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर संस्था ने सभी श्रद्धालुओं से गुरुतत्त्व के चरणों में प्रार्थना करने का आह्वान किया कि ईश्वर उन्हें स्वभावदोषों और अहं से मुक्त होने की शक्ति, निरंतर साधना की प्रेरणा तथा जीवन के प्रत्येक क्षण का वास्तविक आनंद अनुभव करने की कृपा प्रदान करें।
यह विचार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले के तेजस्वी विचारों के संदर्भ में प्रस्तुत किए गए हैं।















