प्रोफेसर दयानंद कादयान : भारत आज विश्व का सबसे युवा देश माना जाता है। देश की लगभग आधी आबादी 30 वर्ष से कम आयु की है। यही युवा शक्ति भारत की आर्थिक प्रगति, वैज्ञानिक उपलब्धियों, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक परिवर्तन की सबसे बड़ी आधारशिला है। लेकिन जब यही युवा अपने भविष्य, शिक्षा और रोजगार को लेकर सड़कों पर उतरने को विवश हो जाए, तब यह केवल एक आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि शासन व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है।
इन दिनों नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की मांग और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार को लेकर बड़ी संख्या में युवा धरने पर बैठे हैं। आंदोलन को कई दिन बीत चुके हैं। यदि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद की जगह मौन ले ले, तो असंतोष धीरे-धीरे अविश्वास और फिर आक्रोश का रूप धारण कर सकता है। यही कारण है कि सरकार और युवाओं के बीच रचनात्मक संवाद आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता हो ती है और युवाओं को उसकी ऊर्जा कहा जाता है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में युवाओं की आकांक्षाओं की अनदेखी करना किसी भी सरकार के लिए उचित नहीं हो सकता। युवाओं की समस्याओं को केवल प्रशासनिक फाइलों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उनके प्रश्नों का समाधान संवेदनशीलता, पारदर्शिता और विश्वास के साथ किया जाना चाहिए। यदि लाखों विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करने के बाद भी परीक्षा प्रणाली पर भरोसा खोने लगें, तो यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र के विश्वास का भी संकट है।
आज प्रतियोगी परीक्षाएं करोड़ों युवाओं के जीवन का आधार हैं। एक परीक्षा का परिणाम केवल अंक नहीं तय करता, बल्कि किसी परिवार की आर्थिक स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। ऐसे में यदि किसी परीक्षा में पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ी, मूल्यांकन संबंधी विवाद या भर्ती प्रक्रिया में विलंब जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो उनका प्रभाव केवल कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहता। इससे पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।
यह भी सत्य है कि सरकार ने हाल के वर्षों में परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। कानून बनाए गए हैं, तकनीकी सुरक्षा बढ़ाई गई है और जांच एजेंसियों को सक्रिय किया गया है। फिर भी जब समय-समय पर विवाद सामने आते हैं, तब यह संकेत मिलता है कि केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। व्यवस्था में निरंतर सुधार, जवाबदेही और पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है।
युवाओं की सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि उन्हें निष्पक्ष अवसर मिले। वे विशेष सुविधा नहीं चाहते, बल्कि समान अवसर और ईमानदार प्रतियोगिता चाहते हैं। यदि परीक्षा की पवित्रता पर संदेह उत्पन्न होता है, तो वर्षों की मेहनत और लाखों सपनों पर पानी फिर जाता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह तकनीकी रूप से सुरक्षित, समयबद्ध और पारदर्शी बनाए। प्रत्येक विवाद की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों को शीघ्र दंड मिले और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस व्यवस्था विकसित की जाए।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में केवल सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है। युवाओं की भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारियां हैं। आंदोलन किसी भी लोकतंत्र का वैध और संवैधानिक अधिकार है, किंतु उसकी सफलता संवाद, अनुशासन और सकारात्मक दृष्टिकोण पर निर्भर करती है। यदि आंदोलन किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का मंच बन जाए, तो मूल मुद्दे अक्सर पीछे छूट जाते हैं। शिक्षा, परीक्षा और रोजगार जैसे विषय किसी एक दल के नहीं, बल्कि पूरे देश के विषय हैं। इसलिए इन मुद्दों को दलगत राजनीति से ऊपर रखकर देखा जाना चाहिए।
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास अनेक छात्र आंदोलनों का साक्षी रहा है। वर्ष 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ छात्र-युवा आंदोलन भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण अध्याय बना। उस दौर में बिहार सहित अनेक राज्यों में छात्रों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और व्यवस्था परिवर्तन की मांग उठाई। आंदोलन के दौरान कई स्थानों पर पुलिस कार्रवाई और दमन की घटनाएं भी हुईं, जिन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक बहस को जन्म दिया। इतिहास यह भी बताता है कि जब संवाद की जगह टकराव ले लेता है, तब लोकतंत्र की संस्थाओं पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है।
इसी प्रकार विभिन्न राज्यों में भी छात्र आंदोलनों ने समय-समय पर शासन व्यवस्था को नई दिशा देने का प्रयास किया। असम आंदोलन इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां छात्रों ने लंबे समय तक लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को उठाया। इन आंदोलनों ने यह स्पष्ट किया कि युवाओं की आवाज को लंबे समय तक अनसुना नहीं किया जा सकता। अंततः किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को समाधान संवाद और सहमति से ही खोजना पड़ता है।
आज भी आवश्यकता इसी बात की है कि इतिहास से सीख लेकर टकराव की बजाय बातचीत का रास्ता चुना जाए। सरकार को चाहिए कि वह आंदोलनकारी युवाओं के प्रतिनिधियों से खुले मन से चर्चा करे, उनकी मांगों को सुने और जहां संभव हो, समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करे। केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे। युवाओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनकी मेहनत और भविष्य सुरक्षित हाथों में है।
दूसरी ओर, आंदोलनरत युवाओं को भी यह समझना होगा कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी नैतिकता और शांति होती है। हिंसा, अराजकता, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या भड़काऊ भाषा किसी भी जनआंदोलन की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहें और आधी-अधूरी सूचनाएं बहुत तेजी से फैलती हैं। ऐसे में आंदोलन का नेतृत्व करने वालों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखें और नकारात्मक वातावरण बनने से बचें।
डिजिटल युग ने संवाद को आसान बनाया है, लेकिन दुर्भाग्य से इसने ध्रुवीकरण और गलत सूचनाओं के प्रसार को भी बढ़ावा दिया है। सोशल मीडिया पर चलने वाले ट्रेंड, भ्रामक वीडियो और अपुष्ट दावे कभी-कभी वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटका देते हैं। इसलिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां तथ्य, तर्क और संवाद को प्राथमिकता मिले।
इस आंदोलन के बीच विभिन्न राजनीतिक नेताओं की सक्रियता भी देखने को मिली है। लोकतंत्र में किसी भी जनआंदोलन के प्रति राजनीतिक दलों का समर्थन या विरोध अस्वाभाविक नहीं है। किंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि शिक्षा और युवाओं के भविष्य जैसे गंभीर विषयों को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम न बनाया जाए। यदि राजनीतिक दल इन मुद्दों पर सकारात्मक सुझाव दें, नीतिगत बहस करें और समाधान प्रस्तुत करें, तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लेकिन यदि आंदोलन केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मंच बन जाए, तो सबसे अधिक नुकसान उन युवाओं का होगा जिनके भविष्य का प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है।
देश की शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। केवल परीक्षा प्रणाली को सुधार देना पर्याप्त नहीं होगा। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए, शोध के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, आधुनिक प्रयोगशालाओं और डिजिटल सुविधाओं का विस्तार हो तथा विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। यदि शिक्षा संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और शोध का वातावरण विकसित होगा, तभी भारत ज्ञान आधारित वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने कई महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किए हैं, किंतु उनकी सफलता प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। जब शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी, तब प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव भी संतुलित होगा और युवाओं के लिए विविध अवसर उपलब्ध होंगे।
रोजगार का प्रश्न भी युवाओं की चिंता का प्रमुख कारण है। प्रतियोगी परीक्षाओं में वर्षों तक प्रतीक्षा, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और परिणामों में अनिश्चितता युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालती है। इसलिए भर्ती प्रक्रिया समयबद्ध, पारदर्शी और उत्तरदायी होनी चाहिए। प्रत्येक सरकारी विभाग में रिक्त पदों की नियमित जानकारी सार्वजनिक हो और नियुक्तियों की प्रक्रिया निर्धारित समय सीमा में पूरी की जाए। इससे युवाओं का विश्वास मजबूत होगा।
आज आवश्यकता किसी की जीत या हार तय करने की नहीं, बल्कि विश्वास बहाली की है। सरकार यदि संवेदनशीलता के साथ संवाद का हाथ बढ़ाती है और युवा सकारात्मक सोच के साथ वार्ता में भाग लेते हैं, तो समाधान अवश्य निकलेगा। लोकतंत्र की सुंदरता यही है कि मतभेदों का समाधान संवाद से होता है, संघर्ष से नहीं।
भारत का भविष्य उसकी युवा शक्ति पर निर्भर है। यदि यही युवा निराश होंगे तो देश की प्रगति की गति भी प्रभावित होगी। लेकिन यदि उन्हें न्यायपूर्ण व्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और निष्पक्ष अवसर मिलेंगे, तो यही युवा भारत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएंगे। इसलिए यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि विश्वास, संवेदनशीलता और साझी जिम्मेदारी का है।
सरकार को चाहिए कि वह युवाओं को केवल मतदाता के रूप में नहीं, बल्कि नीति निर्माण के साझेदार के रूप में देखे। वहीं युवाओं को भी लोकतांत्रिक मूल्यों, संयम और सकारात्मक संवाद की शक्ति पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। जब सरकार की इच्छाशक्ति और युवाओं की ऊर्जा एक दिशा में आगे बढ़ेगी, तभी शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार संभव होगा और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
अंततः किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान उसकी संवाद क्षमता होती है। जहां सरकार जनता की सुनती है और जनता लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करते हुए सकारात्मक माहौल बनाना चाहिए।
प्रोफेसर दयानंद कादयान, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, संस्कारम विश्वविद्यालय पाटोदा (झज्जर)















