कैथल। जगत सद्भावना संस्थान के सानिध्य में प्राचीन श्री शिव ठाकुर द्वारा मंदिर में चल रहे पितृ पक्ष श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर वातावरण भक्तिमय रहा। सद्भावना दूत भागवताचार्य स्वामी डॉ. रमनीक कृष्ण जी महाराज ने इस अवसर पर भरत जी महाराज के तीन जन्मों की कथा का श्रवण कराया।
उन्होंने बताया कि प्रथम जन्म में भरत जी महाराज पांचजनी के राजा बने। राजा होते हुए भी उनका मन प्रभु भक्ति में ही रमा रहा। वैराग्य उत्पन्न होने पर वे वनवासी जीवन में लीन हो गए और प्रभु चिंतन करने लगे। इस दौरान एक प्रसंग में हिरणी का शावक उनकी जीवन साधना का केंद्र बन गया। अंत समय हिरण का स्मरण करने से उनका अगला जन्म हिरण के रूप में हुआ।
द्वितीय जन्म में भी उन्हें पूर्व जीवन की स्मृति बनी रही। तीसरे जन्म में वे जड़ भरत के रूप में अवतरित हुए और सांसारिक मोह से विरक्त होकर प्रभु भक्ति में डूबे रहे। इस जन्म में राजा रहुगण से हुए संवाद में उन्होंने आत्मज्ञान और भक्ति का महत्व समझाते हुए कहा कि— “जब तक जीवन का अहम नहीं मिटेगा, तब तक ज्ञान की प्राप्ति असंभव है।”
कथा के दौरान श्रद्धालु भावविभोर होकर कथा का श्रवण करते रहे। कार्यक्रम में भगवान श्रीकृष्ण जन्म महोत्सव बड़े हर्षोल्लास से मनाया गया।
कथा के पश्चात प्रतिदिन की भांति विशाल भंडारे का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।



















