दीपक शर्मा , मोहाली : हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी नेताओं के बयानों और राजनीतिक गतिविधियों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी चुनावी हार के कारणों को गंभीरता से समझने का प्रयास कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस लगातार चुनावी हार के बाद आत्ममंथन करने के बजाय ईवीएम, सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और वोट चोरी जैसे मुद्दों को आगे रख रही है। हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद भी कांग्रेस नेताओं ने भाजपा पर वोट चोरी के आरोप लगाए थे।
इसी बीच हरियाणा नगर निगम चुनावों के नतीजों ने एक अलग तस्वीर पेश की है। सात निकायों में भाजपा ने 77 पार्षद सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस केवल 9 सीटें जीत सकी। हालांकि अधिकांश वार्डों में कांग्रेस उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे। वहीं 58 निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत ने यह संकेत भी दिया कि मतदाता पूरी तरह किसी एक दल से संतुष्ट नजर नहीं आ रहे।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, कांग्रेस का वोट बैंक अभी भी उसके साथ मौजूद है, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी, गुटबाजी और जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। पार्टी में कर्मठ कार्यकर्ताओं के बजाय चापलूसी करने वाले नेताओं के प्रभाव को भी हार का एक बड़ा कारण माना जा रहा है।
वहीं भाजपा की बड़ी जीत के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवारों की सफलता को एक राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यह परिणाम दर्शाते हैं कि भाजपा के प्रति जनता का समर्थन मजबूत जरूर है, लेकिन पूरी तरह अटूट नहीं। ऐसे में भाजपा और विशेष रूप से हरियाणा सरकार को जनकल्याणकारी योजनाओं और संगठनात्मक मजबूती पर और अधिक ध्यान देना होगा।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि कांग्रेस आत्ममंथन कर संगठन को मजबूत करती है और भाजपा जनता का भरोसा बनाए रखने में विफल रहती है, तो भविष्य के चुनावों में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।















