ललित तिवारी, नैनीताल — उत्तराखंड और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में हाल के वर्षों में आई आपदाएं — भूस्खलन, बाढ़, बादल फटना — केवल प्रकृति की मार नहीं हैं, बल्कि यह हमारे अपने विकास मॉडल की गलतियों का नतीजा भी हैं। जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं पर चर्चा करते समय हम अक्सर उस मौन कारण को नजरअंदाज कर देते हैं, जो पहाड़ों की पारंपरिक समझ और ज्ञान को छोड़ देने से पैदा हुआ है। उत्तराखंड के विकास नाम पर जो सड़के बन रही हैं, वह भी कहीं न कहीं संतुलन खराब कर रही हैं। और अतिक्रमण भी एक बड़ा कारण है, जो पर्यावरण के लिए खतरा है।
सदियों तक पहाड़ों में सीढ़ीदार खेती इन इलाकों की पहचान रही — एक ऐसी विधि, जिसमें मनुष्य ने प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर खेती की। यह केवल जमीन पर सीढ़ियां बनाने का काम नहीं था, बल्कि जल प्रबंधन, मिट्टी संरक्षण और सामुदायिक ज्ञान का एक समग्र विज्ञान था। इन सीढ़ियों से वर्षा का पानी धीरे-धीरे बहता, मिट्टी का कटाव रुकता, भूमि की उर्वरता बनी रहती और अतिरिक्त पानी भूमिगत जलस्तर को पुनर्भरित करता।
लेकिन ‘आधुनिकीकरण’ के नाम पर हमने इस परंपरा को पुराना और अनुपयोगी मानकर छोड़ दिया। कंक्रीट ने खेती की ढलानों को ढक दिया, बिना योजना के सड़कों ने पहाड़ों को काट दिया, और पारंपरिक अनाजों की जगह नकदी फसलें आ गईं, जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल नहीं थीं। नतीजा — पहाड़ों का नाजुक संतुलन बिगड़ गया और वे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति और संवेदनशील हो गए।
इस बदलाव की धुरी हैं पहाड़ों की वे महिलाएं, जो तमाम कठिनाइयों के बावजूद इन परंपराओं को संजोए हुए हैं। वे अब भी अपनी मिट्टी को पढ़ना जानती हैं, सही समय पर बुआई करना जानती हैं और पानी बचाने के प्राकृतिक तरीके जानती हैं। उन्हें केवल विकास योजनाओं की ‘लाभार्थी’ नहीं, बल्कि बदलाव की ‘नेतृत्वकर्ता’ बनाया जाना चाहिए।
इसी कड़ी में उत्तरांचल उत्थान परिषद के चंडीगढ़ संयोजक डॉ. प्रदीप तिवारी ने सभी प्रवासी साथियों से अपील की है कि वे अपने-अपने गांव में पारंपरिक खेती और उसके उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से कार्य करें। उन्होंने कहा कि जितना संभव हो, अपने गांव को बचाने के लिए ग्रामीणों की हरसंभव मदद करें और सरकार की सभी योजनाओं की जानकारी गांव के लोगों तक पहुंचाएं, ताकि वे उनका पूरा लाभ उठा सकें। डॉ. तिवारी ने यह भी कहा कि “हम केवल यह इंतजार न करें कि सरकार क्या करेगी, बल्कि हमें अपने-अपने स्तर पर विचार करना होगा कि हम अपने गांव के लिए क्या कर सकते हैं।”
अगर उत्तराखंड का विकास मॉडल वास्तव में टिकाऊ होना है, तो उसे अपनी जड़ों से जुड़ना होगा — जहां परंपरा और तकनीक साथ-साथ चलें और प्रकृति को विकास में बाधा नहीं, बल्कि उसकी नींव के रूप में देखा जाए।














