
आचार्य रजनीश द्विवेदी : मध्यप्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली माँ नर्मदा केवल करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि राज्य के लिए भगवान का दिया सबसे बड़ा प्राकृतिक जल भंडार भी है। नर्मदा का जल मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों की सिंचाई, पेयजल और ऊर्जा जरूरतों की रीढ़ है। इसके बावजूद बढ़ता प्रदूषण अब सीधे तौर पर जनजीवन के लिए घातक साबित होने लगा है।
हाल ही में इंदौर में नर्मदा जल आपूर्ति लाइन में दूषित पानी मिलने से 16 लोगों की मौत और सैकड़ों के बीमार होने की घटना ने प्रशासन की लापरवाही को उजागर कर दिया है। बताया जा रहा है कि नर्मदा लाइन में कहीं से सीवर का पानी मिल गया, जो सीधे घरों तक पहुंचा और लोगों ने उसे पी लिया। इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब एक लाइन में गंदा पानी मिलने से इतनी बड़ी त्रासदी हो सकती है, तो उन अनगिनत नालों और सीवेज लाइनों का क्या होगा जो प्रतिदिन नर्मदा में गिर रहे हैं।
विशेषज्ञों और संत समाज का कहना है कि यह केवल एक नदी का संकट नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा है। नर्मदा में मिल रहा प्रदूषित जल आने वाले समय में और भी भयावह परिणाम दे सकता है, यदि सरकार और समाज ने मिलकर तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए।
नर्मदा पर बनी बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ सरकार को आर्थिक लाभ देती हैं, लेकिन नदी की सुरक्षा और शुद्धता को लेकर कोई ठोस नीति जमीन पर दिखाई नहीं देती। रेत माफिया, औद्योगिक अपशिष्ट और सीवेज जल मिलकर नर्मदा को धीरे-धीरे ज़हर बना रहे हैं।
संत समाज और पर्यावरणविदों ने सरकार से अपील की है कि माँ नर्मदा को बचाने के लिए युद्ध स्तर पर अभियान चलाया जाए, क्योंकि नर्मदा सुरक्षित होगी तभी आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित रहेंगी।
“माँ नर्मदा सुरक्षित, तो मानव जाति सुरक्षित” – यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।















