राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वाधीनता संग्राम में योगदान को रेखांकित करते हुए संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तथा द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी) की राष्ट्रसेवा एवं स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका को स्मरण किया गया।
जानकारी के अनुसार, डॉ. हेडगेवार ने बाल्यकाल से ही राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया। वर्ष 1907 में उन्होंने विद्यालय में सरकारी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना “वंदे मातरम्” का उद्घोष किया, जिसके कारण उन्हें विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। बाद में वे कलकत्ता में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े और अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया।
दिसंबर 1920 में नागपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा पूर्ण स्वतंत्रता (पूर्ण स्वराज) की मांग को प्रमुखता से रखा। संघ की स्थापना विजयादशमी 1925 को राष्ट्रीय स्वतंत्रता, संगठन, अनुशासन और राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य से की गई थी।
संघ के दस्तावेज़ों के अनुसार, डॉ. हेडगेवार ने असहयोग आंदोलन, झंडा सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विभिन्न राष्ट्रवादी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। सत्याग्रह के दौरान उन्हें कारावास भी भुगतना पड़ा।
दस्तावेज़ में यह भी उल्लेख किया गया है कि क्रांतिकारी राजगुरु संघ से जुड़े थे तथा सॉन्डर्स हत्याकांड के बाद उनके लिए सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था की गई थी। संघ स्वयंसेवकों ने साइमन कमीशन के विरोध में भी भाग लिया।
1940 में डॉ. हेडगेवार ने अपने जीवन के अंतिम चरण में संघ का दायित्व श्री गुरुजी को सौंपा। इसके बाद 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान संघ के अनेक स्वयंसेवकों ने विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। विदर्भ के अस्थी-चिमूर जनविद्रोह में स्वयंसेवकों ने भाग लिया, अनेक कार्यकर्ताओं को कारावास हुआ और कई ने बलिदान भी दिया।
दस्तावेज़ में यह भी उल्लेख है कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई स्वयंसेवकों ने भूमिगत गतिविधियों में सहयोग किया तथा स्वतंत्रता सेनानियों को आश्रय उपलब्ध कराया। श्री गुरुजी ने भी स्वतंत्रता संग्राम के दौर में संघ कार्य के विस्तार और राष्ट्रहित में सक्रियता पर बल दिया।
संघ से जुड़े इस विवरण में कहा गया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए संगठन ने अनुशासन, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक संगठन को मजबूत करने के लिए निरंतर कार्य किया तथा स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरणों में स्वयंसेवकों ने अपने-अपने स्तर पर योगदान दिया।















