हरियाणा को प्रगतिशील, औद्योगिक और युवा राज्य के रूप में जाना जाता है, लेकिन राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था आज एक गंभीर संकट से गुजर रही है। सरकारी विश्वविद्यालयों में फैकल्टी की भारी कमी ने न केवल शिक्षण व्यवस्था को कमजोर किया है, बल्कि शोध एवं नवाचार की पूरी प्रक्रिया को लगभग ठप कर दिया है। यह संकट किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं, बल्कि वर्षों की नीतिगत उदासीनता और विलंबित भर्तियों का परिणाम बन चुका है।
आज राज्य के अधिकांश सरकारी विश्वविद्यालयों में कक्षाएं और परीक्षाएं तो हो रही हैं, लेकिन पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी में स्वीकृत 108 पदों में से लगभग 75 रिक्त हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में 501 स्वीकृत पदों में से 249 खाली पड़े हैं, जिनमें प्रोफेसर के 34 में से 32 और एसोसिएट प्रोफेसर के 72 में से 61 पद वर्षों से रिक्त हैं। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक में इतिहास, समाज विज्ञान और मानविकी जैसे विभाग लगभग फैकल्टी-विहीन हो चुके हैं।
इस स्थिति का सबसे बड़ा प्रभाव शोध पर पड़ा है। पीएचडी शोधार्थियों को समय पर गाइड नहीं मिल पा रहे, शोध समितियां अधूरी हैं और शोध कार्य वर्षों तक अटका रहता है। जेआरएफ और नेट उत्तीर्ण प्रतिभाशाली युवा सरकारी विश्वविद्यालयों से निराश होकर निजी संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं, जो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है।
फैकल्टी की कमी को पूरा करने के लिए विश्वविद्यालय अतिथि और अनुबंध आधारित शिक्षकों पर निर्भर हो रहे हैं। यह व्यवस्था केवल अस्थायी समाधान है, जो न तो शोध संस्कृति को मजबूत कर सकती है और न ही अकादमिक नेतृत्व विकसित कर सकती है। पढ़ाई धीरे-धीरे केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित होती जा रही है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शोध को शिक्षा की आत्मा मानती है, लेकिन जब स्थायी शिक्षक ही नहीं होंगे तो नीति का क्रियान्वयन कैसे होगा? यदि यही स्थिति बनी रही तो हरियाणा के विश्वविद्यालय केवल डिग्री वितरण केंद्र बनकर रह जाएंगे, जबकि छात्रों में नवाचार, आलोचनात्मक सोच और शोध दृष्टि विकसित नहीं हो पाएगी।
शिक्षा को खर्च नहीं, बल्कि निवेश के रूप में देखने की आवश्यकता है। हरियाणा में औद्योगिक विकास तभी टिकाऊ हो सकता है, जब विश्वविद्यालय ज्ञान और नवाचार के केंद्र बनें। इसके लिए सरकार को सभी रिक्त फैकल्टी पदों पर समयबद्ध और पारदर्शी भर्ती, शोध आधारित नियुक्ति-पदोन्नति नीति, विश्वविद्यालयों में शोध अनुदान और आधारभूत ढांचे के सुदृढ़ीकरण जैसे ठोस कदम उठाने होंगे।
हरियाणा के सरकारी विश्वविद्यालयों में फैकल्टी संकट केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि राज्य के बौद्धिक भविष्य, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। अब समय चेतावनी देने का नहीं, कार्रवाई का है। विश्वविद्यालयों में शिक्षक भरना प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य में किया गया सबसे बड़ा निवेश है।
(डॉक्टर दयानंद कादयान, प्रोफेसर जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, संस्कारम विश्वविद्यालय पाटोदा झज्जर।















