देश के शहरी परिवहन को गति देने और स्थायी मोबिलिटी समाधान सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने बीते एक दशक में कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। 2014 में केवल 248 किमी का परिचालन मेट्रो नेटवर्क आज 23 शहरों में 1,013 किमी तक फैल चुका है। इस अवधि में औसत दैनिक सवारियां 28 लाख से बढ़कर 1.12 करोड़ तक पहुंच गईं, जिससे शहरी आवागमन में क्रांतिकारी बदलाव आया है।
सरकार ने मेट्रो विकास के लिए अब तक ₹2.5 लाख करोड़ का निवेश किया है और ‘मेक इन इंडिया’ के तहत 2,000 से अधिक मेट्रो कोच घरेलू स्तर पर तैयार किए हैं। मेट्रो रेल नीति 2017 ने परियोजनाओं को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के साथ-साथ निजी भागीदारी और एकीकृत शहरी गतिशीलता को अनिवार्य किया है।
दिल्ली, कोलकाता, पुणे, बेंगलुरु और अहमदाबाद जैसे शहरों में अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है—चालक रहित ट्रेनें, नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड, क्यूआर टिकटिंग, प्लेटफॉर्म स्क्रीन डोर, और स्वदेशी स्वचालित रेल पर्यवेक्षण प्रणाली (I-ATS) इसके उदाहरण हैं।
हरित ऊर्जा पर जोर देते हुए मेट्रो स्टेशनों पर सोलर प्लांट, रीजेनेरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम और IGBC प्रमाणित इमारतें स्थापित की गई हैं। कोच्चि ने देश की पहली वाटर मेट्रो की शुरुआत कर परिवहन में एक नया मॉडल पेश किया, वहीं कोलकाता ने 2024 में हुगली नदी के नीचे देश की पहली अंडरवाटर मेट्रो सुरंग शुरू की।
आने वाले वर्षों में पुणे मेट्रो चरण-2, दिल्ली मेट्रो विस्तार, अहमदाबाद एयरपोर्ट कनेक्टिविटी, बेंगलुरु मेट्रो चरण-3 और 24 शहरों में जल मेट्रो जैसी परियोजनाएं सार्वजनिक परिवहन को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगी।
तेज, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल मेट्रो नेटवर्क अब केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि भारत की विकासगाथा की धड़कन बन चुका है—जो आने वाले समय में 7.3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में मजबूत रीढ़ साबित होगा।














